कोरोना काल के वो चेहरे|
आया ये कैसा कोरोना
दिखा गया वो अपना रूप घिनौना
दिखा गया वो दुनिया के अलग चेहरे
दे गया दर्द वो कितनो को गहरे|
कुछ थे सतर्क जैसे चौकीदार
लगातार लगते रहे पहरे
कोरोना से डर कर घरों में ही रह रहे|
कुछ ऐसे भी थे जो थे अंधे और बेहरे
घूमेंगे ना डरेंगे कोरोना से हम बार बार वो कह रहे|
खुद तो हुए बीमार औरो को भी डूबा दिया बीच मझदार
ना जाने कितनो को बना दिया लाचार|
कुछ थे मजदूर जिनके पास ना थी मोटर कार
मगर जाना था अपने घर जो था मीलो पार|
चल पड़े सबको पे वो भूके प्यासे
ना जाने वो लाए वो हिम्मत कहा से|
थे कुछ सतर्क पर फिर भी कोरोना ने उन्हें घेरा
बिना गलती के भी छुपा रहे थे चेहरा
समाज ने भी उनको दिखाई तब आंखें
जब कहना चाहिए था आओ मिलकर दुख ये बांटे|
काश लगा लेते हम सब मिल कर वो पहरे
मास्क लगा कर छुपा लेते वो चेहरे
ना देखने पड़ते हमें फिर अपनों में वो बेगाने चेहरे|
1 comment:
Bahut sahi 👍
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