खाई थी आपने वो जो कसम,
फौज में जो रखते कदम।
देश का ना गिरने दोगे अभिमान,
चाहे फिर क्यों ना निकले जान।
जब मना रहे थे लोग प्यार का त्योहार,
कुर्बान हुए हाथो से उनके जो थे गद्दार।
जान से ऊपर रखा था देश प्रेम
याद करते थे सरहद पर,उधर आती थी उसको हिचकी,
आंखें टक टक देख रही उसकी लेते हुए हल्की सी सिस्की
दीवार पर टंगा तुम्हारा वो फोटो फ्रेम।
आखिर में तुम्हारी कसम की ना हुई हार,
जब दुश्मन पर हमारी फौज ने किया भारी प्रहार।
उड़ा दिए उन सबके होश,
और जोर से पूछा हाउस द जोश।
हाथ जोड़ के करते है आपको नमन,
अमर होके भी देश को दे गए चैन और अमन।
फौज में जो रखते कदम।
देश का ना गिरने दोगे अभिमान,
चाहे फिर क्यों ना निकले जान।
जब मना रहे थे लोग प्यार का त्योहार,
कुर्बान हुए हाथो से उनके जो थे गद्दार।
जान से ऊपर रखा था देश प्रेम
याद करते थे सरहद पर,उधर आती थी उसको हिचकी,
आंखें टक टक देख रही उसकी लेते हुए हल्की सी सिस्की
दीवार पर टंगा तुम्हारा वो फोटो फ्रेम।
आखिर में तुम्हारी कसम की ना हुई हार,
जब दुश्मन पर हमारी फौज ने किया भारी प्रहार।
उड़ा दिए उन सबके होश,
और जोर से पूछा हाउस द जोश।
हाथ जोड़ के करते है आपको नमन,
अमर होके भी देश को दे गए चैन और अमन।
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